अकबर इलाहाबादी

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अकबर इलाहाबादी: अकबर ने सैयद अकबर हुसैन के नाम से1846में इलाहाबाद के निकट बारा में एक सम्मानजनक, परिवार में जन्म लिया। उनके पिता का नाम सैयद तफ्फज़ुल हुसैन था। अकबर इलाहाबादी उर्दू भाषा के एक प्रतिभाशाली शायर और लेखक थे। इनके द्वारा लिखे गए लेख स्वतंत्रता संग्राम के समय बहुत ज्यादा मशहूर थी।

🎂जन्म: 16 नवंबर 1846, प्रयागराज
⚰️मृत्यु : 15 फ़रवरी 1921, प्रयागराज
किताबें: Akabara Ilāhābādī, pratinidhi racanāem̐
विषय: प्रेम, दर्शन, धर्म, सामाजिक सुधार, व्यंग्य, ब्रिटिश शासन

बे-पर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीबियाँ 
'अकबर' ज़मीं में ग़ैरत-ए-क़ौमी से गड़ गया 
पूछा जो मैं ने आप का पर्दा वो क्या हुआ 
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया 
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हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है
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शेख़ जी घर से न निकले और लिख कर दे दिया
आप बी०ए० पास हैं तो बन्दा बीवी पास है
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बहसें फिजूल थीं यह खुला हाल देर में 
अफ्सोस उम्र कट गई लफ़्ज़ों के फेर में 
सय्यद अकबर हुसैन  हिन्दुस्तानी ज़बान और हिन्दुस्तानी तहज़ीब के बड़े मज़बूत और दिलेर शायर थे। उनके कलाम में उत्तरी भारत में रहने-बसने वालों की तमाम मानसिक व नैतिक मूल्यों, तहज़ीबी कारनामों, राजनीतिक आंदोलनों और हुकूमती कार्यवाईयों के भरपूर सुराग़ मिलते हैं। उनकी शायरी ज़माना और ज़िंदगी का आईना है। उनका अंदाज़-ए-बयान कहीं कहीं क़लंदराना, कहीं शायराना, कहीं तराश-ख़राश के साथ, कहीं सादा, कहीं पारंपरिक और कहीं आधुनिक और इन्क़िलाबी है। अकबर इलाहाबादी पारंपरिक होते हुए भी बाग़ी थे और बाग़ी होते हुए भी सुधारवादी। वो शायर थे, शोर नहीं मचाते थे। ख़वास और अवाम दोनों उनको अपना शायर समझते थे। उनकी शायरी दोनों के ज़ौक़ को सेराब करती है। उनका कलाम मुकम्मल उर्दू का कलाम है। शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी के अनुसार मीर तक़ी मीर के बाद अकबर इलाहाबादी ने अपने कलाम में उर्दू ज़बान के सबसे ज़्यादा अलफ़ाज़ इस्तेमाल किए हैं।

परिचय

सय्यद अकबर हुसैन इलाहाबादी 16 नवंबर, 1846 ई. को ज़िला इलाहाबाद के क़स्बा बारह में पैदा हुए। वालिद तफ़ज़्ज़ुल हुसैन नायब तहसीलदार थे। अकबर की आरंभिक शिक्षा घर पर हुई। आठ नौ बरस की उम्र में उन्होंने फ़ारसी और अरबी की पाठ्य पुस्तकें पढ़ लीं। फिर उनका दाख़िला मिशन स्कूल में कराया गया। लेकिन घर के आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की वजह से उनको स्कूल छोड़कर पंद्रह साल की ही उम्र में नौकरी तलाश करना पड़ी।

विवाह

उसी कम उम्री में उनकी शादी भी ख़दीजा ख़ातून नाम की एक देहाती लड़की से हो गई लेकिन बीवी उनको पसंद नहीं आईं। उसी उम्र में उन्होंने इलाहाबाद की तवाएफ़ों के कोठों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। इलाहाबाद की शायद ही कोई ख़ूबसूरत और ख़ुशगुलू तवाएफ़ हो जिसके पास वो न गए हों। उन्होंने एक तवाएफ़ बूटा जान से शादी भी कर ली, लेकिन उसका जल्द ही इंतिक़ाल हो गया, जिसका अकबर इलाहाबादी को सदमा रहा।

व्यावसायिक शुरुआत

अकबर इलाहाबादी ने कुछ दिनों रेलवे के एक ठेकेदार के पास 20 रुपये माहवार पर नौकरी की। फिर कुछ दिनों बाद वो काम ख़त्म हो गया। उसी ज़माने में उन्होंने अंग्रेज़ी में कुछ महारत हासिल की और 1867 ई. में वकालत का इम्तिहान पास कर लिया। उन्होंने तीन साल तक वकालत की जिसके बाद वो हाईकोर्ट के मिसिल ख़वाँ बन गए। उस अरसे में उन्होंने जजों-वकीलों और अदालत की कार्यवाईयों को गहराई के साथ समझा। 1873 ई. में उन्होंने हाईकोर्ट की वकालत का इम्तिहान पास किया और थोड़े ही अरसे में उनकी नियुक्ति मुंसिफ़ के पद पर हो गई। उसी ज़माने में उनको शीया घराने की एक लड़की फ़ातिमा सुग़रा पसंद आ गई जिससे उन्होंने शादी कर ली और पहली बीवी को अलग कर दिया, लेकिन उसको मामूली ख़र्च देते रहे। पहली बीवी से उनके दो बेटे थे लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा की कोई पर्वाह नहीं की और उन्होंने बड़ी दरिद्रता में ज़िंदगी गुज़ारी। एक बेटा तो बाप से मिलने की आरज़ू लिए दुनिया से चला गया लेकिन वो उसे देखने नहीं गए।

सन 1888 में अकबर इलाहाबादी ने सबार्डीनेट जज और फिर में ख़ुफ़िया अदालत के जज के पद पर तरक्क़ी पाई और अलीगढ़ सहित विभिन्न स्थानों पर उनके तबादले होते रहे। 1905 में वो सेशन जज के ओहदे से रिटायर हुए और बाक़ी ज़िंदगी इलाहाबाद में गुज़ारी। रिटायरमेंट के बाद उनकी दूसरी बीवी ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहीं। अकबर इस सदमे से सँभल नहीं पाए थे कि दूसरे बीवी के से पैदा होने वाला उनका जवाँ-साल बेटा, जिससे उनको बहुत मुहब्बत थी, चल बसा। इन दु:खों ने उनको पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया और वो निरंतर बीमार रहने लगे। फ़ातिमा सोग़रा से अपने दूसरे बेटे इशरत हुसैन को उन्होंने लंदन भेज कर शिक्षा दिलाई। पहली बीवी ख़दीजा ख़ातून 1920 तक ज़िंदा रहीं लेकिन उनको “इशरत मंज़िल” में क़दम रखने की कभी इजाज़त नहीं मिली। 1907 में सरकार ने अकबर इलाहाबादी को “ख़ान बहादुर” का ख़िताब दिया और उनको इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का फ़ेलो भी बनाया।

मृत्यु
9 सितंबर, 1921 को अकबर इलाहाबादी का देहांत हुआ।

हास्य-व्यंग्य के बादशाह

अकबर इलाहाबादी को उर्दू शायरी में हास्य-व्यंग्य का बादशाह माना जाता है। उनसे पहले उर्दू शायरी में तंज़-ओ-मज़ाह, रेख़्ती या निंदा की शायरी के सिवा, कोई अहमियत और तसलसुल नहीं हासिल कर सका था। अकबर ने तेज़ी से बदले हुए ज़माने को सावधान करने के लिए हास्य-व्यंग्य का नया विधान अपनाया। अकबर के व्यंग्य का उद्देश्य तफ़रीह नहीं बल्कि उसमें एक ख़ास मक़सद है। अकबर की दूर-अँदेश निगाहों ने देखा कि दुनिया बड़ी तेज़ी से बदल रही है और इस वक़्त जो समुदाय पैदा हो रहा है उसको पश्चिमीलोभ बहाए लिए जा रही है और लोग अपनी हिन्दुस्तानी मुलयों को तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगे हैं। उन्होंने अपनी शायरी को मुल्क व राष्ट्र की सेवा की तरफ़ मोड़ते हुए एक नया अंदाज़ इख़्तियार किया, जिसमें वैसे तो ठिठोल और हास्य है लेकिन उसके अन्तःकरण में नसीहत और आलोचना है।

वह अपनी शायरी को जिस रुख पर और जिस उद्देश्य के लिए लेकर चल रहे थे उसके लिए ज़रूरी था कि लब-ओ-लहजा नया, दिलकश और मनपसंद हो। ये एक ऐसे शख़्स का कलाम है जिसके चेहरे पर शगुफ़्तगी और ठिठोली के आसार हैं मगर आवाज़ में ऐसी आँच है जो हास्य को पिघला कर, दिलनशीं होने तक, गंभीरता का दर्जा अता कर देती है। अकबर इलाहाबादी के तंज़ का लक्ष्य कोई व्यक्ति विशेष नहीं होता। हर व्यक्ति प्रथमतः यही समझता है कि तंज़ किसी और की तरफ़ है लेकिन हंस चुकने के बाद ज़रा ग़ौर करने के बाद एहसास होता कि अकबर ने हम सभों को मुख़ातिब किया था और जिसको हम मज़ाक़ समझ रहे थे, उसकी तह में तन्क़ीद-ओ-नसीहत है। बात को इस नतीजे तक पहुंचाने में अकबर ने बड़ी कारीगरी से काम लिया है।

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