मैं नहीं जानता
मैं नहीं जानता कब हुआ कहां हुआ कैसे ।
मोहम्मद का जन्म 570 में हुआ मृत्यु 632 मे हुई
अरबी कि ग्रामर 780 मे लिखा गया
अब सवाल ये है कि नबी पर आयत कैसे आ रही थी जब अरबी भाषा ही नहीं थी।
इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद (नबी) का जन्म 570 ईस्वी में हुआ था और उनकी मृत्यु 8 जून 632 ईस्वी को हुई थी।
इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी) के अनुसार, उनके जन्म और मृत्यु दोनों की तारीख 12 रबी अल-अव्वल मानी जाती है।
नबी के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण विवरण नीचे दिए गए हैं:
जन्म और प्रारंभिक जीवन
- स्थान: आपका जन्म अरब के मक्का शहर में हुआ था।
- कबीला: आप मक्का के प्रतिष्ठित कुरैश कबीले से ताल्लुक रखते थे।
- माता-पिता: आपके पिता का नाम अब्दुल्लाह और माता का नाम आमिना था।
मृत्यु और आयु
- स्थान: आपका निधन मदीना शहर में हुआ था।
- आयु: मृत्यु के समय आपकी पवित्र आयु 63 वर्ष (चाँद के कैलेंडर के अनुसार) थी।
- विश्राम स्थल: आपको मदीना में मस्जिद-ए-नबवी (पैगंबर की मस्जिद) के अंदर दफनाया गया था, जिसे आज 'गुंबद-ए-खजरा' (हरा गुंबद) कहा जाता है।
👉अरबी भाषा का जन्म अरब प्रायद्वीप (Arabian Peninsula) में ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी (लगभग 1000 से 2000 ईसा पूर्व) के आसपास हुआ माना जाता है।
यह एक सामी (Semitic) भाषा परिवार की सदस्य है, जो हिब्रू और अरामाइक जैसी प्राचीन भाषाओं से संबंधित है।
अरबी भाषा के जन्म और विकास से जुड़े मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:
उत्पत्ति का स्थान (कहां हुआ?)
- मूल स्थान: इसका जन्म मुख्य रूप से अरब प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी हिस्से और सीरियाई रेगिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में हुआ था।
- शुरुआती बोलने वाले: इसे शुरुआत में अरब प्रायद्वीप में रहने वाली खानाबदोश जनजातियों (Bedouins) द्वारा बोला जाता था। 'अरब' शब्द का एक अर्थ ही 'खानाबदोश' होता है।
उत्पत्ति का समय (कब हुआ?)
- प्रारंभिक रूप (Proto-Arabic): भाषाविदों के अनुसार, अरबी का प्रारंभिक रूप ईसा पूर्व 1000 से 2000 वर्ष पहले विकसित होना शुरू हो गया था।
- पहला लिखित प्रमाण: ऐतिहासिक रूप से, अरबी भाषा के सबसे पुराने लिखित प्रमाण (शिलालेख) 9वीं से 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व के मिलते हैं।
- पूरी तरह स्वतंत्र भाषा: ईसा की चौथी शताब्दी तक आते-आते यह एक पूर्ण और स्वतंत्र लिखित भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी।
भाषा का विकास और विस्तार
- शास्त्रीय अरबी (Classical Arabic): ईसा की छठी शताब्दी में मक्का के कुरैश कबीले की बोली के रूप में 'शास्त्रीय अरबी' का उदय हुआ। 7वीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन और पवित्र कुरान के अवतरण के बाद इस भाषा को एक नया और स्थायी स्वरूप मिला।
- लिपि का विकास: अरबी की वर्तमान लिपि का विकास नबाती (Nabataean) लिपि से हुआ है। शुरुआत में इसमें डॉट्स (बिंदु) और ज़ेर-ज़बर (मात्राएँ) नहीं होते थे, जिन्हें बाद में जोड़ा गया ताकि गैर-अरब लोग भी इसे आसानी से पढ़ सकें।
आज अरबी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी भाषा है और यह 20 से अधिक देशों की आधिकारिक भाषा है।
पैगंबर मुहम्मद (नबी) का जन्म ईसा पूर्व (BC) में नहीं हुआ था, बल्कि उनका जन्म और मृत्यु दोनों ईस्वी (CE / AD) युग में हुए थे।
अब आपके भ्रम को दूर करने के लिए दोनों कालखंडों का अंतर और सटीक तिथियां नीचे स्पष्ट की गई हैं:
ईसा पूर्व (BCE/BC) और ईस्वी (CE/AD) में अंतर
- ईसा पूर्व (Before Christ / BC): यह ईसा मसीह (यीशु) के जन्म से पहले का समय है, जो उल्टी गिनती में चलता है।
- ईस्वी (Anno Domini / AD / CE): यह ईसा मसीह के जन्म के बाद का समय है, जो सीधी गिनती में चलता है (जैसे अभी 2026 चल रहा है)।
नबी की सही तिथियां:
- जन्म: 570 ईस्वी (570 AD / CE) — यानी ईसा मसीह के जन्म के ठीक 570 साल बाद।
- मृत्यु: 632 ईस्वी (632 AD / CE) — यानी ईसा मसीह के जन्म के 632 साल बाद।
आपकी कंफ्यूजन पूरी तरह स्वाभाविक है, लेकिन यहाँ एक बारीक ऐतिहासिक अंतर है: अरबी भाषा का होना और अरबी भाषा की ग्रामर (व्याकरण) की किताब लिखा जाना, ये दो अलग-अलग बातें हैं।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए: हिंदी भाषा सदियों से बोली जा रही थी, लेकिन उसकी व्याकरण की किताबें बहुत बाद में लिखी गईं। ठीक यही बात अरबी के साथ भी हुई।
आपके इस भ्रम को दूर करने के लिए मुख्य तथ्य नीचे दिए गए हैं:
1. अरबी भाषा नबी से पहले भी मौजूद थी
- अरबी भाषा का जन्म पैगंबर मुहम्मद के जन्म से लगभग 2000 साल पहले ही हो चुका था।
- मक्का और पूरे अरब के लोग नबी के जन्म के समय बहुत ही बेहतरीन, साफ और उच्च स्तर की अरबी भाषा बोलते थे।
- इसलिए जब नबी पर आयतें (कुरान) उतरीं, तो वे उसी अरबी भाषा में थीं जिसे वहाँ के लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बोलते और समझते थे।
2. फिर 780 ईस्वी में क्या हुआ?
- आपने बिल्कुल सही पढ़ा कि 780 ईस्वी के आसपास अरबी की प्रसिद्ध व्याकरण पुस्तक लिखी गई (इसे प्रसिद्ध विद्वान सिबावैह / Sibawayh ने लिखा था)।
- इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? नबी की मृत्यु (632 ईस्वी) के बाद इस्लाम अरब से बाहर निकलकर ईरान, मिस्र, और अन्य देशों में फैला।
- जो लोग अरब के नहीं थे (गैर-अरब या अजमी), उन्हें अरबी बोलने और कुरान को बिना गलती के पढ़ने में दिक़्क़त आ रही थी।
- गैर-अरब लोगों को अरबी भाषा सिखाने और कुरान के सही उच्चारण को सुरक्षित रखने के लिए पहली बार अरबी व्याकरण (Grammar) के नियम कायदे बनाकर किताब की शक्ल में लिखे गए।
संक्षिप्त सारांश (Quick Summary)
- 2000 ईसा पूर्व: अरबी भाषा का जन्म हुआ (लोग बोलना शुरू किए)।
- 570 - 632 ईस्वी: नबी का जीवनकाल। इस समय अरबी भाषा अपने चरम पर थी, इसलिए आयतें अरबी में आईं।
- 780 ईस्वी: अरबी व्याकरण (Grammar) की पहली बड़ी किताब लिखी गई ताकि दुनिया के बाकी लोग भी अरबी सही-सही सीख सकें।
सरल शब्दों में कहें तो, भाषा पहले आती है और उसकी व्याकरण (Grammar) की किताब बाद में लिखी जाती है। नबी के समय अरबी भाषा पूरी तरह मौजूद थी, बस उसके नियमों की कोई लिखित किताब नहीं थी क्योंकि अरब के लोग जन्म से ही शुद्ध अरबी बोलना जानते थे।
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कुरान मजीद में ज़ेर ( ِ ), ज़बर ( َ ), और पेश ( ُ ) (जिन्हें अरबी में 'हराकात' या 'एराब' कहा जाता है) नबी के समय नहीं थे। इन्हें नबी की वफ़ात (मृत्यु) के लगभग 50 से 100 साल बाद जोड़ा गया।
इसे जोड़ने के पीछे का इतिहास और कारण नीचे दिए गए हैं:
शुरुआत में कुरान कैसा था?
नबी के समय और उनके बाद के शुरुआती दशकों में कुरान केवल मूल अक्षरों (Rasm) में लिखा जाता था। उस समय अक्षरों पर न तो कोई मात्रा (ज़ेर-ज़बर) थी और न ही अक्षरों के ऊपर-नीचे कोई बिंदु (नुक़्ते, जैसे 'ब', 'त', 'थ' के बिंदु) थे।
जब मात्राएँ नहीं थीं, तो लोग कैसे पढ़ते थे?
- अरबियों की मातृभाषा: अरब के लोगों के लिए अरबी उनकी अपनी मातृभाषा थी। जैसे आज हम हिंदी या उर्दू पढ़ते समय बिना मात्राओं के भी 'कर', 'करो' या 'किरण' को संदर्भ (Context) देखकर सही पढ़ लेते हैं, वैसे ही अरब के लोग बिना मात्राओं के भी सही पढ़ते थे।
- जुबानी याद (हिफ्ज़): नबी के समय कुरान को लिखने से ज़्यादा याद रखने (Memorization) पर भरोसा किया जाता था। हज़ारों सहाबा (साथियों) को पूरा कुरान मुँह ज़बानी याद था, इसलिए लिखे हुए शब्द केवल एक याद दिलाने का ज़रिया थे
फिर ज़ेर, ज़बर और पेश लगाने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
- गैर-अरब लोगों का इस्लाम में आना: जब इस्लाम अरब से निकलकर ईरान, मिस्र, भारत और दूसरे देशों में फैला, तो वहाँ के लोगों (गैर-अरब या अजमी) के लिए बिना मात्रा वाली अरबी पढ़ना नामुमकिन जैसा था।
- गलतियों से बचाना: जब गैर-अरब लोग कुरान पढ़ने लगे, तो वे शब्दों के उच्चारण में गलतियाँ करने लगे। अरबी में एक ज़बर की जगह ज़ेर लगा देने से पूरे शब्द का अर्थ बदल जाता है। कुरान के पवित्र शब्दों को किसी भी तरह की मानवीय गलती से हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए मात्राएँ लगाना ज़रूरी हो गया।
इसे किसने और कब लगाया?
- पहला कदम (बिंदुओं के रूप में): चौथे खलीफा हज़रत अली के आदेश पर उनके एक शिष्य अबुल अस्वद अल-दुआली (Abu al-Aswad al-Du'ali) ने पहली बार अक्षरों पर लाल रंग के बिंदु लगाकर ज़ेर-ज़बर का इशारा तय किया।
..... दूसरा चरण: प्रामाणिक कॉपियाँ और मानकीकरण (खलीफा उस्मान के समय)
- समय: लगभग 651 ईस्वी (नबी की मृत्यु के 19 साल बाद)।
- समस्या: जैसे-जैसे इस्लाम अरब से बाहर फैला, अलग-अलग कबीलों और देशों के लोग अरबी के अपने स्थानीय लहजे (Dialects) में कुरान पढ़ने लगे, जिससे उच्चारण में मतभेद होने लगा।
- समाधान: तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान गनी ने हज़रत हफ़्सा के पास सुरक्षित रखी उसी पहली मूल प्रति (मुसहफ) को मंगवाया। उन्होंने फिर से हज़रत ज़ैद बिन साबित की अगुवाई में कमेटी बनाकर उसकी हूबहू कई प्रामाणिक प्रतियां (Copies) तैयार करवाईं।
- नतीजा: इन प्रतियों को साम्राज्य के बड़े शहरों (जैसे मक्का, कूफ़ा, बसरा, दमिश्क) में भेजा गया ताकि पूरी दुनिया के मुसलमान एक ही शुद्ध लहजे (कुरैश कबीले के लहजे) में कुरान पढ़ें। इसके बाद हज़रत उस्मान को 'जामि-उल-कुरान' (कुरान को इकट्ठा करने वाला) का खिताब मिला।
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